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माता पराशक्ति के प्रथम मंदिर निर्माण स्थल की ऐतिहासिक कथा – गौरिंदा गाँव, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

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माता पराशक्ति के प्रथम मंदिर निर्माण स्थल की ऐतिहासिक कथा – गौरिंदा गाँव, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

नमस्कार दोस्तों, धर्म रहस्य चैनल में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। आज मैं जो मठ या मंदिर की कथा सुनाने जा रहा हूं, यह अपने आप में सबसे ज्यादा दुर्लभ कथा आप मान सकते हैं क्योंकि इस कथा का ज्ञान आज से पहले किसी को नहीं था। और इस कथा के साथ ही भविष्य में बहुत सारे रहस्यों का भी खुलासा होगा। एक विशेष स्थान जो जगत में प्रसिद्धि का कारण भविष्य में बनेगा। उसी के आधार पर मैं यह रहस्यमई बातें आपको बताने जा रहा हूं। तो इसे भी आप मठ मंदिरों की ही कहानी के रूप में ले सकते हैं और इस दिव्य स्थान की महिमा का वर्णन समय आने पर पूरे जगत को नजर आने वाला है।

तो इस कथा का प्रारंभ होता है एक साधक से जो बचपन से ही माता की भक्ति में लीन था। वह बहुत ही दिव्य और उनके परमोच्च स्वरूप की उपासना किया करता था और वह हमेशा ही उनके ध्यान और भक्ति में लीन रहता था। समय बीतता गया और आखिरकार उसके मन में यह एक प्रश्न आया कि क्यों ना जगत में माता का एक मंदिर मेरे माध्यम से बने और मैं माता के दिव्य स्वरूप को जगत पर सबकी पूजा के लिए लेकर के आऊं।

इस व्यवस्था या परेशानी के आधार पर उसने जगह-जगह मंदिर के लिए उपयुक्त भूमि खोजना प्रारंभ कर दिया। समय बीतता गया और उसे कहीं पर भी सफलता नहीं मिल पा रही थी। कहीं पर कोई परेशानी तो कहीं पर कोई ऐसी समस्या आ जाती जिस की वजह से उस स्थान का चयन होना संभव नहीं लग रहा था। वह लगातार घूमता रहा। कहीं बात बनते बनते बिगड़ जाती तो कहीं किसी परिस्थिति की वजह से चीजें खराब होती जा रही थी। ऐसे ही समय बीतता जा रहा था और इस प्रकार इस प्रकार समय फिर से आगे बढ़ता चला गया। और समय के बीतने के साथ-साथ उसका विश्वास भी डगमगाने लगा कि क्या वह माता के लिए एक मंदिर का निर्माण भी नहीं कर सकता है।

लेकिन समय आने पर ही सारी चीजें होती हैं और आखिरकार वह एक जगह पहुंचा। उस गांव में कुछ लोगों से मिला और उन्होंने एक स्थान के विषय में बताया जहां पर वह जमीन को प्राप्त कर सकता। था तो वह उन लोगों से जाकर मिला और वहां पर बातचीत हुई। बहुत सारे रहस्य उस स्थान से जुड़े हुए थे जिनको अब उसके सामने आने का समय आ चुका था।

जब वह वहां से वापस आ रहा था तो उसके पैर में मिट्टी काफी ज्यादा मात्रा में लग गई और वह धीरे-धीरे जब अपने घर पर वापस आ गया तो रात्रि के समय अचानक से एक तीव्र नींद उसे आई। ऐसी नींद जो आज तक उसे कभी नहीं आई थी। वह अत्यधिक गहरी नींद में चला गया और उस नींद के माध्यम से ही उसे वह ज्ञान प्राप्त हुआ। उस स्थान का परिचय प्राप्त हुआ जहां से वह होकर के आया था।

नींद में उसने पहली ध्वनि सुनी। किसी धातु के धरती को छूने की एक गंभीर आवाज। उसके सामने एक अंधकार सा खुलने लगा। अब जिस स्थान पर वह आज के दिन गया था वह स्थान जहां पर खेत था उस जगह चारों ओर बड़े और ऊंचे वृक्ष थे लताओं से ढके तने गीली मिट्टी और जिसमें आकाश को भी अच्छी प्रकार से देखना संभव नहीं था। एक घना वन एक अत्यंत घना वन था और कुछ ही दूरी पर भूमि के मध्य में एक पुरुष पद्मासन की मुद्रा में बैठा हुआ था। विशाल संयमित देह, जटाओं पर मुकुट, कंधे पर यज्ञोपवित और समीप ही एक फरसा रखा हुआ था। उनकी आंखें बंद थी और उसके आसपास की गंभीर शांति फैली हुई थी।

उन्हें देखकर उस साधक का शरीर जैसे कांपने लगा और उसे पहचान करने में थोड़ा सा भी समय नहीं लगा। भगवान परशुराम जब इस प्रकार उसने कहा तो उस दिव्य पुरुष ने अपनी आंखें खोल दी और उस स्थान पर वह अद्भुत रूप से खड़े हो गए। उनके शरीर से तेज निकल रहा था। तब उसने उनके चरणों में गिरकर कहा मैं प्रभु यहां कहां आ गया हूं। उत्तर मिला जहां से तुम फिर से लौटे हो। इसके लिए मैं तुम्हारे रहस्य खोलने हेतु ही आया हूं।

भगवान परशुराम ने उसकी भृकुटी के मध्य त्रिनेत्र पर अपना अंगूठा रख दिया और उसके सामने अद्भुत चीजें प्रकट होने लगी। धरती पर समय पीछे इतनी तेजी से घूमने लगा। ऐसा लगा कि हजारों वर्ष तेजी से वापस घूम रहे हो और समय सब कुछ बदल रहा था।

तब भगवान परशुराम ने कहा देखो बालक जैसे होता है वैसी ही नवीन पृथ्वी थी। केवल हर तरह वनस्पतियां पेड़पौधे ही नजर आते थे। उस वक्त क्रोध से भरा हुआ मैं आकाश मार्ग से जा रहा था। आकाश में मैं गमन कर रहा था। प्रति शोध की ज्वाला मेरे अंदर भरी हुई थी। मैंने अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं का संहार कर दिया था। और मैं पृथ्वी पर से विचर रहा था।

एक दिन आकाश मार्ग से इसी वन से होकर मैं गुजर रहा था कि मुझे कुछ आकृतियां दिखाई दी। नीचे वृक्षों के लोग छिपते हुए से नजर आ रहे थे। किसी के सिर का मुकुट टूटा था। किसी की देह पर युद्ध कवच था। किसी के हाथ में धनुष की टूटी हुई डोरी लटक रही थी। मुझे लगा यहां कुछ क्षत्रिय योद्धा छिपे हैं। और यह स्थान मेरे पिता के आश्रम से अधिक दूर भी नहीं था।

इसीलिए मैं इस स्थान पर नीचे उतर आया क्योंकि मैंने देखा तो मैं नीचे उतर कर धरती पर जैसे ही उतरा तो देखा कि यह तो जीवित मनुष्य नहीं थे। यह क्षत्रियों की भड़कती हुई आत्माएं थी। इन सबके सिर झुके हुए थे। लेकिन अभी भी वह मेरे क्रोध से डरे हुए जीवात्मा के रूप में भी इधर-उधर भटक रहे थे। सब भागकर इस स्थान पर आए थे और फिर भटकने को और तैयार थे। मैंने ने अपना परसों उठाया और धरती पर पटक दिया।

लेकिन इस स्थान पर जैसे ही मैं उतरा मन अंतःकरण अत्यंत शांत हो गया। ऐसा लगा जैसे कि यह स्थान अत्यंत ही पवित्र और शुद्ध है। तब मेरे मन में एक विचार आया कि क्यों ना इस स्थान पर मैं तपस्या करूं। और फिर मैंने इस स्थान पर वर्षा ऋतु में भी तपस्या करनी शुरू कर दी। मेरे शरीर पर वर्षा होती रही। रात्रियां बीतती रही। लेकिन 21 दिनों तक मैं लगातार तपस्या करता रहा।

21वें दिन अचानक से सामने एक अग्नि की शिखा बनी। सामने अग्नि देव प्रकट हो गए थे। उन्होंने कहा हे ऋषि पुत्र अपने नेत्र खोलिए। उनको सामने देखा तो उनका तेज प्रचंड था। लेकिन फिर भी उनके तेज से एक पत्ता भी जल नहीं रहा था। तब अग्निदेव ने कहा कि आप यहां पर किस लिए तपस्या कर रहे हैं?

तब मैंने कहा मैंने क्षत्रियों का विनाश कर दिया। कई बार विनाश किया किंतु मेरे मन में शांति की प्राप्ति नहीं। नहीं हुई। मैं आज भी बहुत ज्यादा अचरज में हूं और इस प्रश्न को लगातार देख रहा हूं। चाहता हूं कि इसका उत्तर मुझे मिले। मेरा उद्देश्य क्या है? मेरे कर्मों का प्रायश्चित क्या होगा? और मैंने असंख्य शरीर विहीन करके उन्हें आत्मा बनने के लिए भटकने के लिए छोड़ दिया है। है। ऐसे में मेरा यह जीवन का उद्देश्य क्या है?

तब उन्होंने कहा राम तुम प्रश्न लेकर अग्नि के समक्ष आए हो। अग्नि तो सारे उत्तर दे ही देती है। यह लो और तब उन्होंने अपने हाथ में एक भोज पत्र मुझे दिया और कहा तुम्हारे मन में जो भी स्या या प्रश्न है उसे इस भोज पत्र पर लिखकर मुझे दो और आहुति के रूप में समर्पित करो।

उन्होंने अनार की कलम से उस भोज पत्र पर अपने जीवन के प्रश्न मैं कौन हूं और मेरा उद्देश्य क्या है? यह लिखकर अग्नि देव को समर्पित कर दिया। अग्निदेव ने उस प्रश्न को अपनी अग्नि में हवन के रूप में स्वीकार कर जला दिया। और इसके साथ ही जिस स्थान पर अग्नि देव थे उसी स्थान पर एक दिव्य स्वरूप भगवान नारायण का प्रकटीकरण हो गया।

भगवान नारायण ने स्पष्ट सामने आकर मुझे सारा रहस्य समझा दिया। मैं स्वयं नारायण का ही अवतार हूं और धरती पर पाप का अंत करने के लिए ही मैं आया था। ऐसे में इस स्थान पर ही मुझे मेरे मूल रहस्य और पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। तब मैंने नारायण भगवान से अर्थात स्वयं से ही पूछा क्योंकि मैं उनकी परछाई था। यह बताइए यह दिव्य स्थान पर ऐसा क्यों हुआ?

तब उस साधक को बताते हुए भगवान परशुराम ने कहा अब और गहरे अंधकार में उतरना होगा। और उन्होंने अपना अंगूठा दोनों आंखों के बीच भृकुटी में और अंदर तक घुसेड़ दिया। ऐसा लगा साधक को कि अंगूठा ठीक बीच मस्तिष्क तक पहुंच गया है। और उसी के साथ सारे दृश्य एक बार फिर से बदल गए।

धरती पूरी तरह न वयुवती जैसी नजर आ रही थी। केवल वन ही वन। धरती पर शायद मनुष्य का पदार्पण भी ना हुआ हो। ऐसी सुंदर धरती जिस पर हर समय केवल सुंदरता और प्रकृति ही छाई हुई थी। आकाश मार्ग में देखने पर भगवान शिव और माता पार्वती आकाश गमन के माध्यम से उस स्थान से गुजर रहे थे।

माता गौरी की दृष्टि नीचे पड़ी। नाथ देखिए यह वन कितना रमणीय है। भगवान शिव ने मुस्कुरा आकर कहा क्या तुम्हें यहां उतरना है? विश्राम करना है। तब उन्होंने कहा हां मैं इस स्थान पर कुछ समय बिताना चाहती हूं।

माता गौरी भगवान शिव के साथ उस स्थान पर नीचे आ गई और उन्होंने वहां पर चौसर को उत्पन्न कर दिया और कहा आज मन में एक विचार आया है कि इस स्थान पर हम लोग चौसर खेलेंगे। भगवान शिव हंसे और कहा कि अगर हार जाओगी तो रूठ तो नहीं जाओगी। तो गौरी माता ने कहा यह शर्त तो आपको रखनी चाहिए कि कहीं आप नाराज ना हो जाए।

फिर चौसर का खेल शुरू हो जाता है। पहली बाजी माता गौरी ने जीती। दूसरी बाजी भी माता गौरी जीती। तीसरी बाजी भी माता गौरी जीती। खेल चलता गया। भगवान शिव हर बार विजय के मार्ग तक पहुंचते पहुंचते रह जाते और गौरी माता हमेशा अंकों के उस खेल में जीत जाती। इस प्रकार 64 बाजी खेलने के बावजूद भी एक बार भी भगवान शिव जीते नहीं।

भगवान शिव यह देखकर आश्चर्य में पड़ गए और हंसकर कहने लगी गौरी आज तुमने विजेताओं में इंद्र की भांति सब पर विजय प्राप्त की है। इसीलिए मैं तुमको गौरिन्दा (गौरी +इंद्रा) कहूंगा जो, हे गौरी जो विजय इंद्र के समान करती है इसीलिए गौरिंदा, तब गौरी मां ने कहा कि हे प्रभु इसका अर्थ यह है कि गौरी के इंद्र अर्थात स्वामी अर्थात (शिव ) आप मेरे अधीश्वर हैं और आपके बिना मेरी विजय तो कभी संभव हो ही नहीं सकती है।

तब भगवान शिव फिर से हंसने लगे और कहने लगे इसका श्रेय भी तुमने मुझे ही दे दिया। गोटियां तुमने बढ़ाई है। बाजी भी तुमने जीती है। लेकिन फिर भी मैं यह सोच रहा हूं कि बार-बार मेरी विजय ना होकर तुम्हारी विजय कैसे हो रही थी। तब माता मुस्कुराई और कहीं कि यह तो एक विशेष बात है। शक्ति और प्रकृति के सब अधीन है। चाहे वह कोई भी क्यों ना हो स्वयं आप ही क्यों ना हो।

आखिरकार वह वाद-विवाद बढ़ता गया। उस वाद-विवाद की तरंगे इतनी दूर तक पहुंची कि स्वयं भगवान विष्णु, भगवान गणेश और भगवान सूर्य के लोक तक इस प्रश्न और इस ध्वनि का असर देखने को मिला। अब क्योंकि यह प्रश्न भगवान शिव और माता गौरी के बीच था। इसीलिए भगवान विष्णु माता लक्ष्मी सहित, भगवान गणेश अपनी रिद्धि सिद्धि सहित और भगवान सूर्य अपनी पत्नी संध्या के साथ वहां पर स्वर्णिम प्रकाश लिए हुए अवतरित हो गए।

भगवान विष्णु ने चौसर की ओर देखा और कहा कि आज इस खेल ने तो बड़ा प्रश्न उत्पन्न कर दिया है। तब भगवान शिव बोले माधव निर्णय कीजिए 64ों बाजियां गौरी जीत गई हैं और आखिर में विजय मुझे ही सौंप रही हैं। तब लक्ष्मी ने गौरी की ओर देखा और कहा शक्ति भले ही विजयी हो किंतु अपने आधार को अपना गौरव कैसे ना दे।

तब भगवान सूर्य भी कहने लगे प्रकाश वस्तु को प्रकट करता है पर प्रकट होने के लिए वस्तु भी तो होनी चाहिए। यहां एक तो अलग और दूसरे का निर्णय अलग है। तो इस प्रकार से यह बात करते-करते भगवान शिव का मुख गंभीर हो गया और उन्होंने कहा तब तो ध्यान ही मार्ग है। यह पता लगाने का कि आखिर वास्तविकता क्या है? क्यों गौरी ही विजय रही?

कहते हैं उस स्थान पर पांचों लोग भगवान शिव, माता गौरी, भगवान विष्णु, भगवान गणेश और भगवान सूर्य ने सामूहिक रूप से ध्यान किया और लक्ष्मी माता, रिद्धि ,सिद्धि और संध्या उनके साथ दूर से उनके इस कार्य में सहभागी बनी। वन शांत हो गया। पवन धीमी हो गई। सब मूल प्रकृति का ध्यान करने लगे। जिस रूप से सब बनते हैं। जिससे सब उठते हैं।

तभी सभी के अंतर्मन में एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उस प्रकाश के मध्य में सभी को माता के अनंत पराशक्ति स्वरूप के दर्शन हुए। जिस स्वरूप की कोई सीमा नहीं है। जिसकी कोई विस्तार का अंत नहीं है। तब उसके भीतर से एक वाणी प्रकट होती है और कहती है तुम सब मेरे भीतर स्थित हो।

चेतना और प्रकृति को अलग मानकर तुम जिस विवाद को सुलझाना चाहते हो उसका मूल ही अधूरा है। खेल गौरी जीती हैं। प्रेम में अपनी विजय शिव को अर्पित कर रही हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। यह जगत प्रकृति और पुरुष का ही संपूर्ण स्वरूप है। प्रकृति के ही सब कुछ अधीन है। इसीलिए सदैव प्रकृति ही विजय रहेगी।

इस प्रकार वहां पर मूल स्वरूप माता पराशक्ति के दर्शन करने के कारण और इस रहस्य को समझने के कारण स्वयं सभी देवी देवता बड़े प्रसन्न हुए। माता पराशक्ति ने कहा हथेलियों से गौरी तुमने यह रचना या लीला रची है। पांच शक्तियों की उपस्थिति में यह रहस्य प्रकट हुआ है। इसलिए आने वाली मानव संतति की रचना में प्रत्येक हाथ की पांच उंगलियों में कर्म की प्रत्येक भाव और उंगलियों की गति पंच भाव के स्मरण के रूप में जानी जाएंगी। इसीलिए सभी मनुष्यों की शरीर में पांच उंगलियां और पैरों में भी पांच उंगलियां रहेंगी ताकि उन्हें इस दिव्य लाभ को प्राप्त करने और इसका रहस्य समझने में आसानी हो।

फिर क्या हुआ? उस साधक ने भगवान परशुराम से कहा।

उसके बाद इस संगम से उस भूमि की ऊर्जा अत्यंत प्रबल हो गई थी। पांचों देव स्वरूपों ने समझ लिया था कि बिना तैयारी के शक्ति तक पहुंचने वाला उसे अपने अहंकार की वस्तु बना सकता है। तो भगवान शिव ने उस भूमि पर दृष्टि डाली और उन्होंने कहा कि इस जगह को आवृत करना होगा। भगवान विष्णु ने कहा जिसे भीतर से बुलावा होगा वही मार्ग खोजे। इसीलिए इसे बंधनकारी बनाना होगा।

सूर्य ने उस स्थान को ढक दिया। गौरी ने मौन करुणा आच्छादित कर ली और इस प्रकार वह स्थान गोपनीय कर दिया गया।  यह कहा गया कि यह स्थान आज से सदैव के लिए गुप्त रखा जाएगा। सदैव यह गोपनीय बना रहेगा और फिर इस प्रकार समय बीतता चला गया। किंतु एक समय ऐसा आया हे साधक कि जब इस गोपनीयता को और कठोर करना पड़ा और उनके साथ फिर दृश्य भी बदल गए।

एक दिन इसी वन में माता सीता आई थी। वह सूखी लकड़ियां एकत्रित करती हुई वाल्मीकि आश्रम से बहुत दूर निकल आई थी। हाथ में छोटी सी गठ थी। रास्ते में कुछ सूखे तिनके उठाए और फिर गिरी शाखाएं चुनती हुई आगे बढ़ती चली जा रही थी। उनकी चिर परिचित पगडंडी उनसे बहुत दूर हो चुकी थी। उन्होंने चारों ओर देखा। वन अपरिचित था। लेकिन फिर भी वह आगे बढ़ती जा रही थी।

वह उसी वृक्ष के पास आकर ठहर गई जिसके पास कभी चौसर का खेल हुआ था।  इस स्थान की ऊर्जा के कारण अचानक से उनके मन में एक प्रश्न आया कि आखिर जीवन में उनकी भूमिका क्या है? राम से वियोग का कारण क्या है? परीक्षाओं के कितने स्वरूप उन्हें देने पड़ेंगे? आखिर वह कौन है? क्या वह धरती की पुत्री हैं? राम की प्रिया हैं। वन में वास करने वाली हैं। आखिर वह कौन है?

तभी आकाश मार्ग से उड़ता हुआ एक भोज पत्र उनके आगे गिर गया। वहीं पर एक छोटी जली हुई लकड़ी का कोयला बचा था। अचानक से उनके इन प्रश्नों के कारण उनके मन में जो तीव्र बातें उत्पन्न हुई स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गए और कहने लगे देवी आपकी जीवन की परीक्षा के समय मैं आपके साथ था। इसलिए इस वक्त की विडंबना पर भी मैं स्वयं प्रकट हो गया हूं। आप अपने मन की जो भी व्यथा है इस भोज पत्र पर लिखें और मुझे समर्पित कर दीजिए।

इस प्रकार माता सीता ने अपने प्रश्नों को उस भोज पत्र पर काली कालिख से लिखा और उसके तुरंत बाद ही एक बार फिर से अग्नि देव की जगह माता लक्ष्मी का दिव्य स्वरूप उन्हें दिखाई दिया और उनकी पहचान प्रकट हो गई कि वह स्वयं लक्ष्मी है। वह नारायण की शक्ति है। प्रकृति की पोषणमय चेतना है। उस वन में स्वयं वन देवी हैं। अब वह वन देवी के रूप में ही जानी जाएंगी।

तब यह बात अग्निदेव ने कहा। इस अनुभूति को अपने हृदय में सुरक्षित रखिए। इस स्थान का रहस्य किसी भी प्रकार से प्रकट नहीं होना चाहिए। इसीलिए आप इसे पूरी तरह गोपनीय रखते हुए छिपा दीजिए। तब मुस्कुराते हुए देवी सीता वहां से प्रस्थान कर गई और इस प्रकार इसका भेद सदैव भेद ही बना रहा।

समय आगे बढ़ा। एक दिन शुक्राचार्य जी इस भूमि से होकर ऊपर से गुजर रहे थे। अचानक से शिव तत्व का रहस्य समझने वाले वह इस स्थान पर बैठे और उन्होंने भी तपस्या करने की कोशिश की और उनके सामने एक स्पष्ट बात आ गई कि यह स्थान वह दिव्य स्थान है जहां पर चौसर और भोज पत्र के माध्यम से विभिन्न चीजें प्राप्त की जा सकती हैं।

तो उन्होंने असुरों और राक्षसों को यहां आने का निर्देश दिया और अपनी-अपनी परेशानियों, समस्याओं को भोज पत्र पर लिखकर अग्निदेव को समर्पित करने के लिए कहा। मुझे इस बात का विशेष दुख है कि स्वयं अग्नि देव ने उस वक्त प्रकट हो के उन सब की इच्छाओं को पूरा किया।

इस प्रकार असामान्य स्थिति बढ़ने लगी। स्वर्ग के द्वारपाल चकित हो गए। मरने के बाद में अखंड पाप करने वाले राक्षस दानव और दैत्य भी स्वर्ग पहुंचने लगे। जिससे स्वर्ग का वातावरण अस्थिर होने लगा। देव लोक में प्रश्न उठने लगे।

तब भगवान शिव समेत पांचों देव एक साथ फिर इसी स्थान पर इकट्ठा हुए। तब शिव भगवान ने कहा अब समय आ गया है इस स्थान को कलयुग तक पूर्णतः गुप्त कर दिया जाए। पांचों शक्तियों ने एक साथ संकल्प लिया और इस प्रकार यह वन और ज्यादा घना हो गया।

केवल और केवल जब कलयुग में भगवान ने कहा जब चारों तरफ दूर-दूर मेरे मंदिर होंगे और यह स्थान पूरी तरह कलयुग की परिस्थिति में अलग  मत और मतांतरों के युग में फैल चुका होगा। जब प्रत्येक व्यक्ति किसी के भी कथन पर संदेह करता होगा, किसी भी बात पर तुरंत विश्वास नहीं करता होगा, तभी यहां पर देवी का कोई प्रिय भक्त आएगा और वही इस स्थान के रहस्य को जगत के सामने लेकर आएगा और जगत का कल्याण करेगा।

तब तक के लिए इस स्थान को गोपनीय कर दिया जाए और इस प्रकार हमेशा के लिए यह स्थान गोपनीय हो गया। कहते हैं इस स्थान के नजदीक ही भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन एक बार से गुजरे थे -(बिल्लेश्वर महादेव मंदिर) तो भगवान कृष्ण को इस स्थान का ज्ञान हो गया था। किंतु फिर भी उन्होंने अर्जुन को इसके विषय में नहीं बताया। इस प्रकार से यह समय बीतता चला गया।

आखिरकार अब वह समय आ चुका है। अब तुम्हें इसकी आगे की क्रियाएं करनी है। अंकों के रहस्य और इस स्थान पर भोज पत्र के माध्यम से अपनी मनोकामना को पूरा करने और उस पर लगा हुआ भगवान शिव का एक प्रतिबंध के आधार पर प्रत्येक जीव का कल्याण हो। यही उद्देश्य था जो प्रकट होना था। क्योंकि मैं इस स्थान से जुड़ा हूं और यहां मैंने तपस्या की थी।कलयुग में यह स्थान गायों के रखने के स्थान के रूप में प्रसिद्द रहा  इसीलिए आज तुम्हें इस सत्य का दर्शन करवा रहा हूं।

तो इस प्रकार से उस स्थान की पूरी महिमा और रहस्य प्रकट हो गया। और इसके बाद साधक ने अब उस स्थान पर माता पराशक्ति के दिव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया था।

गौरिन्दा (गौरिन्दा परसंदन) का आगे का इतिहास – 

गोरिंदा की स्थापना के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण विवरण 1877 में प्रकाशित Gazetteer of the Province of Oudh के प्रथम खंड में मिलता है।

इस ग्रंथ के पृष्ठ 589 पर GORINDA PARSANDAN शीर्षक के अंतर्गत बताया गया है कि गोरिंदा खास, उन्नाव से लगभग 18 मील उत्तर दिशा में स्थित था। तत्कालीन विवरण के अनुसार पूरा क्षेत्र पहले जंगल और बंजर भूमि से घिरा हुआ था।

उस समय अहीर समुदाय के पशुपालक अपने पशुओं को चराने तथा रखने के लिए जंगल में अस्थायी बाड़े बनाते थे। इन बाड़ों को स्थानीय भाषा में गोंडा कहा जाता था।

गजेटियर में दर्ज विवरण के अनुसार लगभग 500 वर्ष पहले दो व्यक्तियों ने जंगल साफ करके यहाँ स्थायी बसावट स्थापित की:

  • गुरबंस राय (Gurbans Rae) — उपाध्याय ब्राह्मण।

  • गोबिंद राय (Gobind Rae) — कायस्थ समुदाय से संबंधित।

इन दोनों के प्रयासों से जंगल में स्थायी बस्ती विकसित हुई। जो बाद में गोरिंदा कहलाने लगा।

यहाँ 500 वर्ष की अवधि गजेटियर लिखे जाने के समय से संबंधित है। इसलिए इसे लगभग चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की परंपरागत बसावट का संकेत माना जा सकता है, न कि किसी निश्चित स्थापना-वर्ष का प्रमाण।

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मूल ऐतिहासिक संदर्भ:

अवध गजेटियर, खंड प्रथम, पृष्ठ 589 — गोरिंदा की स्थापना1877 के मूल गजेटियर की स्कैन प्रति

गोरिंदा नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में कई संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण वह व्याख्या है जो ब्रिटिशकालीन अवध गजेटियर में दर्ज है।

भगवान परशुराम की तपस्या और परसंदन का धार्मिक इतिहास

गोरिंदा से जुड़े ऐतिहासिक अध्ययन का सबसे रोचक धार्मिक पक्ष परसंदन की स्थापना संबंधी परंपरा है।

Gazetteer of the Province of Oudh के तीसरे खंड में PARSANDAN शीर्षक के अंतर्गत एक प्राचीन कथा दर्ज की गई है।

इस विवरण के अनुसार परसंदन के आसपास किसी समय घना जंगल था। स्थानीय परंपरा में माना जाता था कि भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम ने इस स्थान पर तपस्या की थी।

उनकी तपस्या की तिथि निश्चित नहीं बताई गई है।

गजेटियर में यह भी दर्ज है कि उनके पूजा या तपस्थल के कुछ चिह्नों के विद्यमान होने की बात कही जाती थी। इन्हीं चिह्नों के कारण राजा उग्रसेन का ध्यान इस स्थान की ओर आकर्षित हुआ।

इस प्रकार परसंदन के इतिहास में भगवान परशुराम का संबंध स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में ब्रिटिशकालीन लिखित स्रोत में सुरक्षित है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि उन्नीसवीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में परशुराम की तपस्या संबंधी मान्यता प्रचलित थी।

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मूल संदर्भ:

अवध गजेटियर — परसंदन, परशुराम और राजा उग्रसेन का उल्लेखइंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पर उपलब्ध ऐतिहासिक गजेटियर की प्रति

राजा उग्रसेन ने कैसे बसाया परसंदन?

गजेटियर में दर्ज परंपरा के अनुसार राजा उग्रसेन यमुना नदी के दूसरी ओर से इस क्षेत्र में आए थे।

बताया जाता है कि भगवान परशुराम की तपस्या से जुड़े पूजा स्थल के अवशेषों या चिह्नों ने उन्हें इस स्थान की ओर आकर्षित किया।

इसके बाद राजा उग्रसेन ने यहाँ के जंगल साफ करवाए और एक बस्ती या नगर की स्थापना की।

इस प्रकार परसंदन की स्थापना संबंधी परंपरा में दो प्रमुख व्यक्तित्व सामने आते हैं—भगवान परशुराम, जिनसे स्थान की धार्मिक महत्ता जुड़ी बताई गई, और राजा उग्रसेन, जिनसे नगर की स्थापना जुड़ी है।

सेंगर राजपूतों और स्थानीय राजवंशों का इतिहास

गोरिंदा–परसंदन के मध्यकालीन इतिहास में सेंगर राजपूतों का भी उल्लेख मिलता है।

अवध गजेटियर में सेंगर परिवारों के विस्तार, स्थानीय संघर्षों और विभिन्न स्थानों पर उनके अधिकार का विवरण दिया गया है।

इन विवरणों के अनुसार सेंगर परिवार की शाखाएँ परसंदन, कुषहरी, मनोरा और कंठा आदि स्थानों से संबंधित थीं।

कुषहरी की एक शाखा को गोरिंदा परगने के चौधरी की उपाधि मिलने का भी उल्लेख मिलता है।

इससे संकेत मिलता है कि गोरिंदा–परसंदन केवल धार्मिक परंपराओं वाला स्थान नहीं था, बल्कि मध्यकाल और औपनिवेशिक काल में स्थानीय भूमि-अधिकार, जमींदारी तथा प्रशासनिक व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा था।

Wikimedia Commons

ऐतिहासिक दस्तावेज:

अवध गजेटियर की मूल PDF — सेंगर राजपूतों और गोरिंदा क्षेत्र का विवरण

मुगल काल से ब्रिटिश शासन तक गोरिंदा–परसंदन

उन्नाव जिले की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार अकबर के शासनकाल में वर्तमान उन्नाव जिले का क्षेत्र अवध प्रांत के लखनऊ सरकार में शामिल था। उस समय की प्रशासनिक इकाइयों को महाल कहा जाता था, जो बाद के परगनों के पूर्ववर्ती रूप थे।

अवध के नवाबों के शासनकाल में भी क्षेत्र विभिन्न चकलों और परगनों में विभाजित रहा।

1856 में अंग्रेज़ों द्वारा अवध का विलय किए जाने के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन हुआ। उस समय स्थापित जिले के 13 परगनों में गोरिंदा–परसंदन भी सम्मिलित था।

इसके बाद 1857–58 के विद्रोह और 1869 के प्रशासनिक परिवर्तनों के साथ उन्नाव जिले की सीमाओं तथा प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन हुए।

गजेटियर के अनुसार गोरिंदा और परसंदन का संयुक्त परगना बनना ब्रिटिशकालीन राजस्व बंदोबस्त से जुड़ा था।

India+1

सरकारी स्रोत:

उन्नाव जिला प्रशासन — आधिकारिक ऐतिहासिक विवरणउन्नाव जिले का परिचय, नामकरण और प्रशासनिक इतिहास

आधुनिक सरकारी दस्तावेजों में परशुराम परंपरा का उल्लेख

इस विषय में एक अन्य महत्वपूर्ण संदर्भ उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन से संबंधित उन्नाव जिला कौशल विकास योजना के दस्तावेज में मिलता है।

इस दस्तावेज के ऐतिहासिक परिचय में हसनगंज तहसील के परसंदन क्षेत्र को ऋषि परशुराम की परंपरा से जोड़ा गया है।

यह उल्लेख महत्वपूर्ण है, क्योंकि परशुराम संबंधी स्थानीय मान्यता केवल उन्नीसवीं शताब्दी के गजेटियर तक सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि आधुनिक प्रशासनिक परिचय में भी इसका उल्लेख मिलता है

UP Skill Development Mission

आधिकारिक PDF:

उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन — उन्नाव जिला कौशल विकास योजना

गौरिन्दा (गौरिन्दा परसंदन) उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की हसनगंज तहसील में स्थित एक ऐतिहासिक परगना और क्षेत्र है।

प्रशासनिक और भौगोलिक विवरण

  • तहसील और ब्लॉक: यह क्षेत्र हसनगंज तहसील और नवाबगंज विकासखंड (ब्लॉक) के अंतर्गत आता है। [1, 2]

  • पिन कोड: इस क्षेत्र का मुख्य डाकघर पिन कोड 209859 (नवाबगंज, उन्नाव) है। [1, 2]

  • ग्राम पंचायत: यहाँ गौरेंदा ग्राम पंचायत कार्यरत है, जिसके तहत गौरेंदा और मजगवां जैसे गाँव शामिल हैं। [1]

दूरी और कनेक्टिविटी

  • लखनऊ से दूरी: यह गाँव राज्य की राजधानी लखनऊ से लगभग 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे यहाँ से राजधानी तक आना-जाना काफी सुगम है। [1]

  • उन्नाव जिला मुख्यालय: जिला मुख्यालय उन्नाव से इसकी दूरी लगभग 41 किलोमीटर (पूर्व दिशा में) है। [1]

  • नवाबगंज टाउन: यह नवाबगंज मुख्य शहर से लगभग 19 किलोमीटर दूर स्थित है। [1]

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